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bhagavat 10.88.17: [शुकदेव गोस्वामी ने कहा :] इस तरह से सलाह पाकर, वह राक्षस केदारनाथ में भगवान शिव की पूजा करने गया, जहाँ उसने अपने शरीर से मांस काटना शुरू कर दिया और पवित्र अग्नि में जो भगवान शिव का मुँह है, उसे चढ़ाना शुरू कर दिया।   |   bhagavat अध्याय 10.88: वृकासुर से शिवजी की रक्षा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 88: वृकासुर से शिवजी की रक्षा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.88.17 
इत्यादिष्टस्तमसुर उपाधावत् स्वगात्रत: ।
केदार आत्मक्रव्येण जुह्वानोऽग्निमुखं हरम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
[शुकदेव गोस्वामी ने कहा :] इस तरह से सलाह पाकर, वह राक्षस केदारनाथ में भगवान शिव की पूजा करने गया, जहाँ उसने अपने शरीर से मांस काटना शुरू कर दिया और पवित्र अग्नि में जो भगवान शिव का मुँह है, उसे चढ़ाना शुरू कर दिया।
 
[Sukadeva Goswami said] : After being thus instructed, the demon went to worship Lord Siva at Kedarnath, where he began cutting off pieces of flesh from his body and offering them as oblations in the sacred fire, which is the mouth of Siva.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)