श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 86: अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण तथा कृष्ण द्वारा अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया जाना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  10.86.57 
तस्माद् ब्रह्मऋषीनेतान् ब्रह्मन् मच्छ्रद्धयार्चय ।
एवं चेदर्चितोऽस्म्यद्धा नान्यथा भूरिभूतिभि: ॥ ५७ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे ब्राह्मण, तुम्हें इन ब्रह्मर्षियों की पूजा उसी श्रद्धा से करनी चाहिए, जैसी श्रद्धा तुम मुझमें रखते हो। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम मेरी प्रत्यक्ष पूजा करोगे, जो तुम धन-धान्य आदि का चढ़ावा चढ़ाकर भी नहीं कर सकते।
 
Therefore, O Brahmin, you should worship these Brahmarishis with the same devotion you have for me. If you do so, you will worship me directly, which you cannot do even by offering abundant wealth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)