श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 86: अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण तथा कृष्ण द्वारा अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया जाना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  10.86.39 
तृणपीठबृषीष्वेतानानीतेषूपवेश्य स: ।
स्वागतेनाभिनन्द्याङ्‍‍घ्रीन् सभार्योऽवनिजे मुदा ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
घास तथा दर्भ तृण से बनी चटाइयाँ लाकर तथा अपने अतिथियों को उन पर बैठाकर, उसने स्वागत के शब्दों द्वारा उनका सत्कार किया। तब उसने तथा उसकी पत्नी ने बड़ी ही प्रसन्नता के साथ उनके चरण पखारे।
 
घास तथा दर्भ तृण से बनी चटाइयाँ लाकर तथा अपने अतिथियों को उन पर बैठाकर, उसने स्वागत के शब्दों द्वारा उनका सत्कार किया। तब उसने तथा उसकी पत्नी ने बड़ी ही प्रसन्नता के साथ उनके चरण पखारे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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