जब जनकवंशी राजा बहुलाश्व ने दूर से भगवान श्री कृष्ण और साथ में ऋषि-मुनियों को यात्रा में थके हुए अपने निवास की ओर आते देखा, तो उन्होंने तुरंत उनके लिए सम्मानित आसनों की व्यवस्था करवाई। जब वे सब सम्मानपूर्वक बैठ गए, तो प्रज्ञावान राजा बहुलाश्व का हृदय प्रसन्नता से भर गया और उनकी आँखें आनंद के आँसुओं से छलक आईं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और ऋषि-मुनियों को नमन किया और गहन भक्ति के साथ उनके चरणों को धोया। उस प्रक्षालन-जल को, जो सारे संसार को शुद्ध कर सकता था, उन्होंने अपने सिर पर और अपने परिवार के सदस्यों के सिर पर छिड़का। तत्पश्चात, उन्होंने महानुभावों की पूजा सुगंधित चंदन लेप, फूल की मालाओं, सुंदर वस्त्रों, आभूषणों, अगरबत्ती, दीपक, अर्घ्य तथा गायों और बैलों की भेंट देकर की।
When Bahulāsva, a descendant of Janaka, saw from a distance Lord Kṛṣṇa approaching his house with the sages, who were somewhat weary from their journey, he immediately arranged for seats of honour to be brought for them. When they were all comfortably seated, the wise king, whose heart was overflowing with joy and whose eyes were dim with tears, bowed down to them all and washed their feet with deep devotion. Then he sprinkled this cleansing water, which can purify the entire world, on his own head and on the heads of his family members. Thereafter he worshipped those noble souls with fragrant sandalwood paste, garlands of flowers, beautiful clothes and ornaments, aguru, lamps, arghya and offerings of cows and bulls.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद टिप्पणी करते हैं: "विदेह के राजा बहुलाश्व बहुत बुद्धिमान और एक पूर्ण सज्जन थे। वह बहुत आश्चर्यचकित थे कि उनके घर में खुद भगवान और कितने महात्मा आये हुए हैं। वो भली प्रकार जानते थे कि संसार के मामलों में जुड़े हुए जीव कभी भी पूरी तरह शुद्ध नहीं हो सकते जहाँ दूसरी ओर भगवान और उनके शुद्ध भक्त संसारिक दोषों से सदैव परे होते हैं। इसलिए जब उन्होंने देखा कि भगवान श्री कृष्ण और सभी महात्मा उनके घर आये हैं, तो वो आश्चर्यचकित हो गए और भगवान कृष्ण को उनकी अकारण कृपा के लिए धन्यवाद देने लगे।"
इस श्लोक में ईश्वर का अर्थ मात्र भगवान ही नहीं बल्कि उनके साथ आये हुए श्रेष्ठ संत भी है; इस बात की पुष्टि विद्वान श्रीधर स्वामी और विश्वनाथ चक्रवर्ती ने की है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥