तेभ्य: स्ववीक्षणविनष्टतमिस्रदृग्भ्य:
क्षेमं त्रिलोकगुरुरर्थदृशं च यच्छन् ।
शृण्वन् दिगन्तधवलं स्वयशोऽशुभघ्नं
गीतं सुरैर्नृभिरगाच्छनकैर्विदेहान् ॥ २१ ॥
अनुवाद
तीन लोकों के गुरु भगवान श्री कृष्ण ने उन लोगों पर, जो उन्हें दर्शन करने आए थे, मात्र अपनी दृष्टि डालकर भौतिकतावाद के अँधेरे से उबारकर उन्हें निर्भीकता और दिव्य दृष्टि प्रदान की। साथ ही, उन्होंने देवताओं और मनुष्यों को अपने गुणों का गुणगान करते हुए सुना, जो पूरे ब्रह्मांड को शुद्ध करता है और सभी दुर्भाग्य को नष्ट कर देता है। धीरे-धीरे, वे विदेह पहुँचे।
Lord Krishna, the teacher of the three worlds, delivered all those who came to see Him from the darkness of materialism by simply casting His glance upon them. Thus giving them fearlessness and divine sight, the Lord heard demigods and men singing the praises of Him as the purifier of the entire universe and destroyer of all misfortunes. Gradually He reached Videha.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी ने तार्किक सवाल उठाया कि जिस मार्ग पर सामान्य लोग थे, वे भगवान को कैसे देख सकते हैं, क्योंकि न केवल उनकी आँखे अज्ञानता से ढकी हुई थीं, बल्कि भगवान का रथ हवा से भी तेजी से यात्रा कर रहा था। उत्तर देते हुए, श्रील जीव इंगित करते हैं कि भगवान कृष्ण की दया से विशेष रूप से नजर उनमें से हर एक को उनकी संगति में प्रवेश करने के लिए आवश्यक भक्तिमय पवित्रता प्रदान करती है। अन्यथा, वह देखने की उनकी शक्ति के दायरे से बाहर रहते, जैसा कि उन्होंने स्वयं उद्धव को दिए अपने निर्देशों में कहा था: भक्त्याहमेकाय ग्राह्यः। "मैं केवल भक्ति से ही समझा जा सकता हूँ।" (भाग। 11.14.21) एक-शेष के रूप में जाने जाने वाले यौगिक निर्माण के व्याकरणिक नियम से, शब्द sta-vīkṣaṇa-vinaṣṭa-tamisra-dṛgbhyaḥ, यद्यपि इसके प्राथमिक अर्थ में एक पुल्लिंग संज्ञा के रूप में विभक्त है, इस संदर्भ में पुरुषों और महिलाओं दोनों को संदर्भित करने वाली समझी जा सकती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥