तयो: प्रसन्नो भगवान् दारुकेणाहृतं रथम् ।
आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभु: ॥ १७ ॥
अनुवाद
इन दोनों के प्रसन्न होने पर, दारुक द्वारा लाए गए अपने रथ पर भगवान् ने मुनियों की टोली सहित विदेह की यात्रा की।
Pleased with both of them, the Lord, riding on His chariot brought by Daruka, travelled to Videha along with the group of sages.
तात्पर्य
इस श्लोक पर अपने विवरण में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने बताया है कि श्रुतदेव और बहुलाश्व भगवान कृष्ण से मिलने द्वारिका नहीं जा सके क्योंकि दोनों ने घर पर अपने व्यक्तिगत देवता की पूजा नियमित रूप से करने का व्रत लिया था। श्री कृष्ण उन दोनों को अपना दर्शन देने में बहुत खुश थे और द्वारिका छोड़ते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि जो ऋषि उनके साथ आना चाहते थे, वे उनके रथ पर उनके साथ शामिल हो जाएँ, क्योंकि अन्यथा पैदल चलने पर वे थक जाएँगे। प्रसिद्ध ऋषि आमतौर पर कभी भी ऐसे भव्य वाहन में यात्रा करने पर विचार नहीं करेंगे, लेकिन प्रभु के आदेश पर उन्होंने अपने स्वभाविक विरोध को अलग रखा और उनके साथ उनके रथ पर शामिल हो गए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥