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श्लोक 10.85.57  |
तं दृष्ट्वा देवकी देवी मृतागमननिर्गमम् ।
मेने सुविस्मिता मायां कृष्णस्य रचितां नृप ॥ ५७ ॥ |
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| अनुवाद |
| देवकी अपने बेटों को मृत्यु से वापस लौटते और फिर चले जाते देखकर आश्चर्यचकित हो गईं। उन्होंने मन ही मन सोचा कि यह सब श्री कृष्ण की ही एक माया है। |
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| देवकी अपने बेटों को मृत्यु से वापस लौटते और फिर चले जाते देखकर आश्चर्यचकित हो गईं। उन्होंने मन ही मन सोचा कि यह सब श्री कृष्ण की ही एक माया है। |
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