श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.85.4 
यत्र येन यतो यस्य यस्मै यद् यद् यथा यदा ।
स्यादिदं भगवान् साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वर: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
आप सर्वोच्च पुरुषोत्तम भगवान हैं, जो प्रकृति और प्रकृति के स्रष्टा (महाविष्णु) दोनों के स्वामी के रूप में प्रकट होते हैं। यद्यपि जो कुछ भी अस्तित्व में आता है, चाहे वह कैसे और जब भी आता हो, वह आपके भीतर, आपके द्वारा, आपसे, आपके लिए और आपके संबंध में ही निर्मित होता है।
 
आप सर्वोच्च पुरुषोत्तम भगवान हैं, जो प्रकृति और प्रकृति के स्रष्टा (महाविष्णु) दोनों के स्वामी के रूप में प्रकट होते हैं। यद्यपि जो कुछ भी अस्तित्व में आता है, चाहे वह कैसे और जब भी आता हो, वह आपके भीतर, आपके द्वारा, आपसे, आपके लिए और आपके संबंध में ही निर्मित होता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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