श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  10.85.37 
समर्हयामास स तौ विभूतिभि-
र्महार्हवस्‍त्राभरणानुलेपनै: ।
ताम्बूलदीपामृतभक्षणादिभि:
स्वगोत्रवित्तात्मसमर्पणेन च ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
उसने अपनी सारी उपलब्ध सम्पत्ति - कीमती कपड़े, जेवर, सुगन्धित चन्दन का लेप, पान, दीपक, श्रेष्ठ भोजन और अन्य चीज़ों से उन दोनों की पूजा की। इस प्रकार उसने उन्हें अपने परिवार की सारी धन-सम्पत्ति तो अर्पित ही की, साथ ही उन पर अपने आप को भी न्योछावर कर दिया।
 
He worshipped them with all the wealth he had—precious clothes, jewelry, fragrant sandalwood paste, betel leaves, lamps, nectar-like food, etc. Thus, he offered them all the wealth of his family and himself as well.
तात्पर्य
बालि महाराज की भक्तिमय भावना पूर्ण आत्म-समर्पण के उत्तम उदाहरण के रूप में प्रसिद्ध है। जब भगवान विष्णु एक युवा ब्राह्मण छात्र के वेश में उनसे दान के लिए संपर्क किया, बालि ने अपने पास जो कुछ भी था सब कुछ समर्पित कर दिया, और जब उनके पास देने के लिए और कुछ नहीं बचा, उन्होंने खुद को परमेश्वर के शाश्वत僕 के रूप में समर्पित कर दिया। भक्ति सेवा की नौ मानक प्रक्रियाएँ हैं, और अंतिम, आत्म-समर्पणम, जैसा कि बालि दैत्यराज ने सिखाया है, वह परिणति है जिसकी ओर हर प्रयास का उद्देश्य होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति धन, शक्ति, बुद्धिमत्ता आदि के साथ भगवान को प्रभावित करने की कोशिश करता है, लेकिन विनम्रतापूर्वक खुद को उसका सेवक समझने में विफल रहता है, तो उसकी तथाकथित भक्ति केवल एक अनुमानित प्रदर्शन है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)