श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  10.85.3 
कृष्ण कृष्ण महायोगिन् सङ्कर्षण सनातन ।
जाने वामस्य यत् साक्षात् प्रधानपुरुषौ परौ ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
[वसुदेव ने कहा:] हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे योगीश्रेष्ठ, हे नित्य संकर्षण, मैं जानता हूँ की तुम दोनों ही स्वयं सृष्टि के कारणस्वरूप और साथ ही साथ सृष्टि के अवयव भी हो।
 
[Vasudeva said]: O Krishna, O Krishna, O best of Yogis, O Eternal Sankarsana, I know that both of you are individually the cause of the creation of the universe as well as the components of the creation.
तात्पर्य
जैसा कि भगवान कपिलदेव के सांख्य दर्शन में सिखाया गया है, प्रधान पुरुष, सर्वोच्च व्यक्ति की सृजनात्मक ऊर्जा है। इसलिए, इन दो सिद्धांतों में से, प्रधान प्रबल ऊर्जा है, स्त्री, स्वतंत्र कर्म में असमर्थ, जबकि पुरुष पूर्ण स्वतंत्र, आदिम निर्माता और आनंद लेने वाला है। न तो कृष्ण और न ही उनके भाई बलराम अधीनस्थ ऊर्जा की श्रेणी में आते हैं; बल्कि, वे दोनों मिलकर मूल पुरुष हैं, जो हमेशा आनंद, ज्ञान और रचनात्मक अभिव्यक्ति की अपनी बहुआयामी शक्तियों के साथ जुड़े रहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)