श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.85.14 
तस्मान्न सन्त्यमी भावा यर्हि त्वयि विकल्पिता: ।
त्वं चामीषु विकारेषु ह्यन्यदाव्यावहारिक: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार प्रकृति के परिवर्तनशील स्वरूप वाले ये निर्मित जीव तभी तक अस्तित्व में रहते हैं जब भौतिक प्रकृति उन्हें आपके भीतर प्रकट करती है। उस समय आप भी उनके भीतर प्रकट होते हैं। परंतु सृष्टि के ऐसे अवसरों के अलावा आप दिव्य सद्भाव के समान एकाकी ही बने रहते हैं।
 
Thus these created beings, which are the transformations of nature, exist only when material nature manifests them within You. At that time You also manifest within them. But apart from such occasions of creation You remain alone as the divine Truth.
तात्पर्य
जब समय-समय पर ब्रह्मांड का संहार होता है, तो सभी जड़ वस्तुएं और जीवों के शरीर जिन्हें प्रभु माया से अभी तक प्रकट किया गया था, उसकी सर्वव्यापक दृष्टि से अलग हो जाते हैं। फिर चूँकि वह सार्वभौमिक विघटन की अवधि के दौरान उनके साथ कोई संबंध नहीं बनाए रखता है, वे वास्तव में अब अस्तित्व में नहीं रहते हैं। दूसरे शब्दों में, भौतिक अभिव्यक्तियों का वास्तविक, कार्यशील अस्तित्व केवल तभी होता है जब प्रभु अपना ध्यान भौतिक ब्रह्मांड के निर्माण और रखरखाव की ओर लगाते हैं। प्रभु कभी भी किसी भी भौतिक अर्थों में इन वस्तुओं के "अंदर" नहीं हैं, लेकिन वह दयालुतापूर्वक उन सभी में अवैयक्तिक ब्रह्म के रूप में व्याप्त हैं, और परमात्मा के रूप में वे प्रत्येक परमाणु में प्रवेश करते हैं और व्यक्तिगत रूप में भी जीव आत्माओं का साथ देते हैं। जैसा कि प्रभु ने भगवद गीता (9.4-5) के छंदों में अपने शब्दों में वर्णन किया है:

माया ततमिदम सर्वं

जगदव्यक्त-मूर्तिना

मत-स्थाणि सर्व-भूतानि

ना चाहां तेष्ववस्थितः

ना च मत-स्थाणि भूतानि

पश्य मे योगम ऐश्वरम

भूत-भृन्नच भूत-स्थो

मामात्मा भूत-भावनः

"मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, इस संपूर्ण ब्रह्मांड का व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं हूँ। और फिर भी सभी जो कुछ बनाया गया है वह मुझमें नहीं टिका है। मेरे रहस्यमयी ऐश्वर्य को देखो! यद्यपि मैं सभी जीवों का पालनहार हूँ और यद्यपि मैं हर जगह हूँ, मैं इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का हिस्सा नहीं हूँ, क्यूँकि मेरा स्वरूप सृष्टि का स्रोत है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)