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श्लोक 10.85.14  |
तस्मान्न सन्त्यमी भावा यर्हि त्वयि विकल्पिता: ।
त्वं चामीषु विकारेषु ह्यन्यदाव्यावहारिक: ॥ १४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार प्रकृति के परिवर्तनशील स्वरूप वाले ये निर्मित जीव तभी तक अस्तित्व में रहते हैं जब भौतिक प्रकृति उन्हें आपके भीतर प्रकट करती है। उस समय आप भी उनके भीतर प्रकट होते हैं। परंतु सृष्टि के ऐसे अवसरों के अलावा आप दिव्य सद्भाव के समान एकाकी ही बने रहते हैं। |
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| इस प्रकार प्रकृति के परिवर्तनशील स्वरूप वाले ये निर्मित जीव तभी तक अस्तित्व में रहते हैं जब भौतिक प्रकृति उन्हें आपके भीतर प्रकट करती है। उस समय आप भी उनके भीतर प्रकट होते हैं। परंतु सृष्टि के ऐसे अवसरों के अलावा आप दिव्य सद्भाव के समान एकाकी ही बने रहते हैं। |
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