श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  10.84.55-56 
बन्धून् सदारान् ससुतान् पारिबर्हेण भूयसा ।
विदर्भकोशलकुरून् काशिकेकयसृञ्जयान् ॥ ५५ ॥
सदस्यर्त्विक्सुरगणान् नृभूतपितृचारणान् ।
श्रीनिकेतमनुज्ञाप्य शंसन्त: प्रययु: क्रतुम् ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपने सभी संबंधियों को - उनकी पत्नियों और बच्चों सहित, विदर्भ, कोशल, कुरु, काशी, केकय और सृंजय राज्यों के राजाओं को, सभा के कार्यकर्ता सदस्यों को और पुरोहितों को, दर्शक देवताओं को, मनुष्यों को, भूत-प्रेतों को, पितरों को और चारणों को बड़ी-बड़ी भेंटें दीं। तब भाग्य की देवी, लक्ष्मी की शरण में रहनेवाले भगवान कृष्ण से अनुमति लेकर विविध अतिथि वसुदेव के यज्ञ की महिमा का गुणगान करते हुए वहाँ से विदा हुए।
 
He gave large gifts to all his relatives including his wives and sons, to the kings of Vidarbha, Kosala, Kuru, Kashi, Kekaya and Srinjaya kingdoms, to the officiating members of the assembly and to the priests, to the spectating gods, human beings, ghosts and spirits, ancestors and bards. Then, taking permission from Lord Krishna, the abode of Lakshmi, the various guests left the place singing the glories of Vasudeva's sacrifice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)