श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 83: कृष्ण की रानियों से द्रौपदी की भेंट  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  10.83.31 
एवं वृते भगवति मयेशे नृपयूथपा: ।
न सेहिरे याज्ञसेनि स्पर्धन्तो हृच्छयातुरा: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
हे द्रौपदी, भगवान् का मेरे द्वारा चुना जाना प्रमुख राजाओं को सहन नहीं हुआ। कामातुर होने के कारण वे झगड़ालू हो गए।
 
O Draupadi, the prominent kings could not tolerate my choosing the Lord. They began fighting and quarreling because they were aroused in lust.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी टिप्पणी करते हैं कि वासना के दूषित होने से राजा अपनी परम शक्ति को देखने के बाद भी मूर्खता से प्रभु से झगड़ने को प्रेरित हुए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)