श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 83: कृष्ण की रानियों से द्रौपदी की भेंट  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  10.83.3 
कुतोऽशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवं
महन्मनस्तो मुखनि:सृतं क्व‍‍चित् ।
पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभो
देहंभृतां देहकृदस्मृतिच्छिदम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
[भगवान् कृष्ण के सम्बन्धियों ने कहा] : हे प्रभु, जिन लोगों ने आपके चरणकमलों से निकला हुआ अमृत एक बार भी स्वतंत्र रूप से चख लिया हो, उन पर विपत्ति कैसे आ सकती है? यह मदोन्मत्त करने वाला पेय बड़े-बड़े भक्तों के दिल से बहता है और उनके मुँह से निकलकर उनके कानों के प्यालों में उड़ेला जाता है। ये सभी संसारिक जीवों के इस भ्रम को नष्ट कर देता है कि वे अपने शरीर के निर्माता को भूल सकते हैं।
 
[The relatives of Lord Krishna said]: O Lord, how can misfortune befall those who have drunk heartily of the nectar that has come from Your lotus feet? This intoxicating liquid flows from the minds of great devotees, flows out of their mouths, and is poured into the cups of their ears. It destroys the forgetfulness of the embodied souls about the Maker of their bodies.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)