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bhagavat 10.83.18: मेरे पिता, बृहत्सेन, स्वभाव से अपनी बेटी के प्रति दयालु थे और हे साध्वी, यह जानते हुए कि मैं कैसा महसूस कर रही थी, उन्होंने मेरी इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था की।   |   bhagavat अध्याय 10.83: कृष्ण की रानियों से द्रौपदी की भेंट   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 83: कृष्ण की रानियों से द्रौपदी की भेंट  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  10.83.18 
ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवत्सल: ।
बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत् ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे पिता, बृहत्सेन, स्वभाव से अपनी बेटी के प्रति दयालु थे और हे साध्वी, यह जानते हुए कि मैं कैसा महसूस कर रही थी, उन्होंने मेरी इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था की।
 
My father Brihatsena was by nature compassionate towards his daughter, and, O chaste lady, knowing how I was feeling, he arranged to fulfill my wish.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)