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bhagavat 10.81.35: भगवान अपने सबसे बड़े वरदानों को भी तुच्छ मानते हैं, जबकि वह अपने शुभचिंतक भक्त द्वारा की गई छोटी सी सेवा को भी बहुत बढ़ा देते हैं। इस तरह परम आत्मा ने मेरे द्वारा लाये गये एक मुट्ठी चावल को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।   |   bhagavat अध्याय 10.81: भगवान् द्वारा सुदामा ब्राह्मण को वरदान   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 81: भगवान् द्वारा सुदामा ब्राह्मण को वरदान  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  10.81.35 
किञ्चित्करोत्युर्वपि यत् स्वदत्तं
सुहृत्कृतं फल्ग्वपि भूरिकारी ।
मयोपनीतं पृथुकैकमुष्टिं
प्रत्यग्रहीत् प्रीतियुतो महात्मा ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान अपने सबसे बड़े वरदानों को भी तुच्छ मानते हैं, जबकि वह अपने शुभचिंतक भक्त द्वारा की गई छोटी सी सेवा को भी बहुत बढ़ा देते हैं। इस तरह परम आत्मा ने मेरे द्वारा लाये गये एक मुट्ठी चावल को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया।
 
God considers even his greatest boons insignificant, but greatly appreciates the smallest service rendered by his well-wishing devotee. In this way, God gladly accepted the handful of rice brought by me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)