ननु ब्रह्मन् भगवत: सखा साक्षाच्छ्रिय: पति: ।
ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च भगवान् सात्वतर्षभ: ॥ ९ ॥
अनुवाद
[सुदामा की पत्नी ने कहा]: हे ब्राह्मण, क्या यह सच नहीं है कि लक्ष्मी जी के पति देव आपके मित्र हैं? यादवों में श्रेष्ठ भगवान कृष्ण ब्राह्मणों पर दयालु हैं और उन्हें अपनी शरण देने के लिए अत्यंत इच्छुक रहते हैं।
[Sudama's wife said]: O brāhmaṇa, is it not true that the husband of Lakṣmījī is your personal friend? That Lord Kṛṣṇa, the best of the Yadavas, is kind to the brāhmaṇas and is very willing to give them shelter.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने अपनी टीका में बताया है कि ब्राह्मण की पत्नी ने हर संभावित आपत्ति का अनुमान लगा लिया था जो उसके पति उनके भगवान कृष्ण के पास दान मांगने जाने पर उठा सकते थे। अगर ब्राह्मण यह कह सकता है कि "सौभाग्य की देवी के पति कैसे मेरे जैसे पतित व्यक्ति से मित्रता करेंगे?" वह यह कहकर जवाब देती है कि भगवान कृष्ण ब्रह्मण्य हैं, जो ब्राह्मणों के प्रति बहुत अनुकूल हैं। अगर सुदामा यह दावा कर सकते हैं कि भगवान के लिए उनकी कोई वास्तविक भक्ति नहीं है, तो वह यह कहकर जवाब देती है कि वह एक महान और बुद्धिमान व्यक्तित्व हैं जो निश्चित रूप से भगवान की शरण और दया प्राप्त करेंगे। अगर ब्राह्मण यह आपत्ति कर सकते हैं भगवान कृष्ण असंख्य दुखी जीवों के प्रति समान रूप से अनुकूल हैं जो अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं, तो वह जवाब देती है कि भगवान कृष्ण विशेष रूप से भक्तों के भगवान हैं, और इसलिए भले ही वह स्वयं सुदामा पर कृपा न करें, निश्चित रूप से भगवान की सेवा में लगे भक्त दयालुतापूर्वक उसे कुछ दान देंगे। चूंकि भगवान सात्वतों की रक्षा करते हैं, जो यदु वंश के सदस्य हैं, तो उनके लिए सुदामा जैसे एक विनम्र ब्राह्मण की रक्षा करने में क्या कठिनाई होगी, और ऐसा करने में क्या गलती होगी?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥