श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 80: द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण से ब्राह्मण सुदामा की भेंट  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  10.80.25-26 
किमनेन कृतं पुण्यमवधूतेन भिक्षुणा ।
श्रिया हीनेन लोकेऽस्मिन् गर्हितेनाधमेन च ॥ २५ ॥
योऽसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भृत: ।
पर्यङ्कस्थां श्रियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
[राजमहल के निवासियों ने कहा]: यह सादा और निर्धन ब्राह्मण किस तरह के पुण्य कार्य कर सका है? लोग उसे नीचे और तुच्छ समझते हैं, पर फिर भी तीनों लोकों के स्वामी और देवी लक्ष्मी के निवास, भगवान् स्वयं उसकी सेवा में लगे हुए हैं। देवी लक्ष्मी को अपने पलंग पर बिठाए छोड़कर, भगवान् ने इस ब्राह्मण को गले लगाया है, मानों वह उनका बड़ा भाई हो।
 
[The inhabitants of the palace said] : What pious deed has this disheveled poor Brahmin performed? People consider him lowly and despicable, yet the Guru of the three worlds and the abode of Goddess Shridevi are respectfully serving him. Leaving Lakshmi sitting on his bed, the Lord has embraced this Brahmin as if he were his elder brother.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)