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श्लोक 10.80.19  |
सख्यु: प्रियस्य विप्रर्षेरङ्गसङ्गातिनिर्वृत: ।
प्रीतो व्यमुञ्चदब्बिन्दून् नेत्राभ्यां पुष्करेक्षण: ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| प्रेम के वशीभूत होकर अपने प्रिय मित्र विद्वान ब्राह्मण के शरीर का स्पर्श पाकर कमलनयन भगवान ने प्रेम के आंसू बहाए। |
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| प्रेम के वशीभूत होकर अपने प्रिय मित्र विद्वान ब्राह्मण के शरीर का स्पर्श पाकर कमलनयन भगवान ने प्रेम के आंसू बहाए। |
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