|
| |
| |
श्लोक 10.80.15  |
स तानादाय विप्राग्र्य: प्रययौ द्वारकां किल ।
कृष्णसन्दर्शनं मह्यं कथं स्यादिति चिन्तयन् ॥ १५ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| वह साधु ब्राह्मण चिउड़ा लेकर द्वारका की ओर चल दिया, और सोचता रहा "मैं कैसे कृष्ण से मिल पाऊँगा?" |
| |
| वह साधु ब्राह्मण चिउड़ा लेकर द्वारका की ओर चल दिया, और सोचता रहा "मैं कैसे कृष्ण से मिल पाऊँगा?" |
| ✨ ai-generated |
| |
|