श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  10.8.23 
तन्मातरौ निजसुतौ घृणया स्‍नुवन्त्यौ
पङ्काङ्गरागरुचिरावुपगृह्य दोर्भ्याम् ।
दत्त्वा स्तनं प्रपिबतो: स्म मुखं निरीक्ष्य
मुग्धस्मिताल्पदशनं ययतु: प्रमोदम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
दोनों बालक गाय के गोबर-गोमूत्र मिले कीचड़ से सने होने पर भी अत्यंत सुंदर दिखाई दे रहे थे और जब वे अपनी-अपनी माताओं की गोद में गए तब यशोदा और रोहिणी ने बड़े लाड़ प्यार के साथ उन्हें उठाया, छाती से लगाया और स्तनों से बह रहा दूध पिलाने लगीं। स्तनपान करते समय दोनों बालक मुस्कुरा रहे थे और उनके छोटे-छोटे दांत दिखाई दे रहे थे। उनके सुंदर छोटे-छोटे दांत देखकर उनकी माताओं को परम आनंद हुआ।
 
Both the children were looking very beautiful covered with mud mixed with cow dung and cow urine and when they went to their mothers, Yashoda and Rohini picked them up lovingly, hugged them and fed them the milk flowing from their breasts. While breastfeeding, both the children were smiling and their teeth were visible. Their mothers were extremely happy to see their beautiful little teeth.
तात्पर्य
जैसे ही माताएं अपने-अपने बच्चों की देखभाल करती थीं, योग माया की व्यवस्था से बच्चे सोचते थे कि "यहाँ मेरी माँ है" और माताएँ सोचती थीं कि "यहाँ मेरा बेटा है।" स्नेह के कारण, माताओं के स्तनों से स्वाभाविक रूप से दूध बहता था, और बच्चे उसे पीते थे। जब माताओं ने छोटे-छोटे दाँत आते हुए देखे, तो वे उन्हें गिनती करती थीं और प्रसन्न होती थीं, और जब बच्चों ने अपनी माताओं को उन्हें अपना स्तन-दूध पीने देते हुए देखा, तो बच्चों को भी पारलौकिक आनंद महसूस हुआ। जैसे-जैसे रोहिणी और बलराम तथा यशोदा और कृष्ण के बीच यह पारलौकिक स्नेह बढ़ता गया, वे सभी पारलौकिक आनंद का अनुभव करने लगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)