बाला देव वास्तव में देवकी के पुत्र थे, लेकिन उन्हें देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया था। यह तथ्य छिपाकर रखा गया था। हरिवंश के एक कथन के अनुसार:
प्रत्युवाच ततो रामः
सर्वाम्स तान् अभितः स्थितान
यादवेष्व पि सर्वेषु
भवन्तो मम वल्लभाः
गर्ग मुनि ने नंद महाराज को यह बता दिया कि बलराम को संकर्षण इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने दो परिवारों - यदु-वंश और नन्द महाराज के वंश - को एक किया था। इनमें से एक को क्षत्रिय और दूसरे को वैश्य के रूप में जाना जाता था। दोनों परिवारों का एक ही मूल पूर्वज था, केवल अंतर यह था कि नंद महाराज एक वैश्य पत्नी के पुत्र थे जबकि वसुदेव एक क्षत्रिय पत्नी के पुत्र थे। बाद में, नंद महाराज ने एक वैश्य पत्नी से विवाह किया, और वसुदेव ने एक क्षत्रिय पत्नी से विवाह किया। इसलिए, हालांकि नंद महाराज और वसुदेव दोनों परिवार एक ही पिता से आते थे, लेकिन उन्हें क्षत्रिय और वैश्य के रूप में विभाजित किया गया था। अब बलादेव ने उन्हें एकजुट किया और इसलिए उन्हें संकर्षण के नाम से जाना जाने लगा।
