श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 75: दुर्योधन का मानमर्दन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  10.75.30 
इत्थं राजा धर्मसुतो मनोरथमहार्णवम् ।
सुदुस्तरं समुत्तीर्य कृष्णेनासीद् गतज्वर: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर, भगवान श्री कृष्ण की कृपा से अपनी इच्छाओं के विशाल और दुर्लंघ्य समुद्र को भलीभाँति पार करके अपनी प्रबल महत्वाकांक्षा से मुक्त हो गये।
 
In this way, by the grace of Lord Krishna, King Yudhishthira, the son of Dharma, crossed the vast and impassable ocean of his desires and became free from his intense ambition.
तात्पर्य
श्रीमद् भागवत के पिछले अध्याय स्पष्ट रूप से बताते हैं कि राजा युधिष्ठिर दुनिया को कृष्ण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व और उन लोगों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले आशीर्वाद को प्रदर्शित करने की तीव्र इच्छा रखते थे जो उन्हें समर्पित करते हैं। ऐसा करने के लिए, राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया, जो एक बहुत कठिन कार्य था।

श्रील प्रभुपाद इस संबंध में लिखते हैं: "भौतिक दुनिया में, हर किसी की पूर्ति की जाने वाली एक विशेष प्रकार की इच्छा होती है, लेकिन कोई भी अपनी इच्छाओं को अपनी संतुष्टि के अनुसार पूरा करने में सक्षम नहीं होता है। लेकिन राजा युधिष्ठिर, भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अडिग भक्ति के कारण, राजसूय यज्ञ के प्रदर्शन से अपनी सभी इच्छाओं को सफलतापूर्वक पूरा कर सके। राजसूय यज्ञ के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा कार्य समृद्ध इच्छाओं का एक महान सागर है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए ऐसे सागर को पार करना संभव नहीं है; फिर भी, भगवान कृष्ण की कृपा से, राजा युधिष्ठिर बहुत आसानी से इसे पार करने में सक्षम थे, और इस प्रकार वह सभी चिंताओं से मुक्त हो गए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)