श्रील प्रभुपाद इस संबंध में लिखते हैं: "भौतिक दुनिया में, हर किसी की पूर्ति की जाने वाली एक विशेष प्रकार की इच्छा होती है, लेकिन कोई भी अपनी इच्छाओं को अपनी संतुष्टि के अनुसार पूरा करने में सक्षम नहीं होता है। लेकिन राजा युधिष्ठिर, भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अडिग भक्ति के कारण, राजसूय यज्ञ के प्रदर्शन से अपनी सभी इच्छाओं को सफलतापूर्वक पूरा कर सके। राजसूय यज्ञ के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा कार्य समृद्ध इच्छाओं का एक महान सागर है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए ऐसे सागर को पार करना संभव नहीं है; फिर भी, भगवान कृष्ण की कृपा से, राजा युधिष्ठिर बहुत आसानी से इसे पार करने में सक्षम थे, और इस प्रकार वह सभी चिंताओं से मुक्त हो गए।"
