श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 74: राजसूय यज्ञ में शिशुपाल का उद्धार  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  10.74.36 
ययातिनैषां हि कुलं शप्तं सद्भ‍िर्बहिष्कृतम् ।
वृथापानरतं शश्वत् सपर्यां कथमर्हति ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
ययाति ने इन यादवों के कुल को शाप दिया था, तभी से ईमानदार लोगों ने इनका बहिष्कार कर दिया है और ये शराब के आदी हो गए हैं। ऐसे में, कृष्ण पूजा के योग्य कैसे हो सकते हैं?
 
Yayati had cursed the Yadav clan, since then these people were ostracized by honest people and they became addicted to alcohol. Then how is Krishna worthy of worship?
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने शिशुपाल के शब्दों के आंतरिक अर्थ को यह दिखाने के लिए दिया कि कैसे वह अनजाने में भगवान कृष्ण और उनके यादव वंश का महिमामंडन करता रहा: "यद्यपि यदुओं को ययाति द्वारा शाप दिया गया था, लेकिन उन्हें इस शाप से महान संतों द्वारा [बहिष्कृत]मुक्त कर दिया गया है और परिणामस्वरूप वे कार्तावीर्य जैसे लोगों द्वारा शाही संप्रभुता की स्थिति तक बढ़ा दिए गए हैं। इस प्रकार वे पृथ्वी की रक्षा करते हुए पाण में लीन हो गए हैं। यह सब विचार करने के बाद, यदुओं के प्रमुख कृष्ण, बेकार [वृथा] उपासना के पात्र कैसे हैं? बल्कि, वह भव्य उपासना के पात्र हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)