श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  10.7.27 
तमश्मानं मन्यमान आत्मनो गुरुमत्तया ।
गले गृहीत उत्स्रष्टुं नाशक्नोदद्भ‍ुतार्भकम् ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण के भारी वजन के कारण, त्रिनावर्त इसे एक विशाल पर्वत या लोहे के बड़े टुकड़े जैसा मान रहा था। लेकिन क्योंकि कृष्ण ने राक्षस की गर्दन पकड़ रखी थी, राक्षस उन्हें फेंकने में असमर्थ था। इसलिए उसने सोचा कि यह बच्चा अद्भुत है, क्योंकि वह न तो उसे संभाल सकता है और न ही उस बोझ को दूर फेंक सकता है।
 
Due to Krishna's weight, Trinavart was considering him to be a huge mountain or a lump of iron. But Krishna had caught the demon's neck so he was unable to throw him away. So he thought that this child is amazing, due to which I can neither carry him nor throw this weight away.
तात्पर्य
तृणावर्त का इरादा कृष्ण को आकाश में उठाकर मार डालने का था, लेकिन कृष्ण ने तृणावर्त के शरीर पर सवारी करने और कुछ देर के लिए आकाश में विचरण करने के मनोरंजन का आनंद लिया। इस प्रकार तृणावर्त का कृष्ण को मारने का प्रयास विफल हो गया, जबकि आनंद-चिनमय-रस-विग्रह कृष्ण ने इस मनोरंजन का आनंद लिया। अब, चूँकि तृणावर्त कृष्ण के भारीपन के कारण गिर रहा था, वह अपनी जान बचाना चाहता था और कृष्ण को अपनी गर्दन से फेंकना चाहता था, लेकिन ऐसा करने में असमर्थ था क्योंकि कृष्ण ने उसे बहुत कसकर पकड़ रखा था। परिणामस्वरूप, तृणावर्त की योग शक्ति के लिए यह आखिरी बार होगा। अब कृष्ण की व्यवस्था से उसकी मृत्यु होने जा रही थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)