श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 69: नारद मुनि द्वारा द्वारका में भगवान्  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  10.69.37 
अथोवाच हृषीकेशं नारद: प्रहसन्निव ।
योगमायोदयं वीक्ष्य मानुषीमीयुषो गतिम् ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार योगमाया के इस दृश्य को देखने के बाद नारद मुस्कराए और तब उन्होंने भगवान हृषीकेश को सम्बोधित किया जो मनुष्य का आचरण कर रहे थे।
 
Seeing this manifestation of the Lord's Yogamaya, Narada smiled and then he addressed Lord Hrishikesa who was behaving like a human being.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, नारद भगवान की सर्वव्यापकता को समझते थे, इस लिए जब उन्होंने भगवान को अपने मंत्रियों का भाव जानने की कोशिश करते हुए वेष बदल कर इधर-उधर घूमते हुए देखा, तब नारद अपनी हँसी रोक नहीं पाए। परन्तु फिर भगवान के सर्वोच्च पद को याद करके उन्होंने अपनी हँसी को कुछ रोक लिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)