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श्लोक 10.67.25  |
यादवेन्द्रोऽपि तं दोर्भ्यां त्यक्त्वा मुषललाङ्गले ।
जत्रावभ्यर्दयत्क्रुद्ध: सोऽपतद् रुधिरं वमन् ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् क्रुद्ध यादवेन्द्र ने अपनी गदा और हल को एक ओर फेंक दिया और अपने खाली हाथों से द्विविद की हड्डी पर जोरदार प्रहार किया। वानर रक्त उगलता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। |
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| तत्पश्चात् क्रुद्ध यादवेन्द्र ने अपनी गदा और हल को एक ओर फेंक दिया और अपने खाली हाथों से द्विविद की हड्डी पर जोरदार प्रहार किया। वानर रक्त उगलता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। |
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