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श्लोक 10.67.18  |
तं तु सङ्कर्षणो मूर्ध्नि पतन्तमचलो यथा ।
प्रतिजग्राह बलवान् सुनन्देनाहनच्च तम् ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| किन्तु भगवान संकर्षण पर्वत की तरह स्थिर रहे और अपने सिर पर गिरते हुए लट्ठे को तुरंत पकड़ लिया। तत्पश्चात् उन्होंने द्विविद पर अपनी सुनंदा गदा से प्रहार किया। |
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| किन्तु भगवान संकर्षण पर्वत की तरह स्थिर रहे और अपने सिर पर गिरते हुए लट्ठे को तुरंत पकड़ लिया। तत्पश्चात् उन्होंने द्विविद पर अपनी सुनंदा गदा से प्रहार किया। |
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