श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 67: बलराम द्वारा द्विविद वानर का वध  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  10.67.14-15 
तं ग्राव्णा प्राहरत् क्रुद्धो बल: प्रहरतां वर: ।
स वञ्चयित्वा ग्रावाणं मदिराकलशं कपि: ॥ १४ ॥
गृहीत्वा हेलयामास धूर्तस्तं कोपयन् हसन् ।
निर्भिद्य कलशं दुष्टो वासांस्यास्फालयद् बलम् ।
कदर्थीकृत्य बलवान् विप्रचक्रे मदोद्धत: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
बलराम, सर्वश्रेष्ठ सेनानी, क्रुद्ध हो गए और उस पर एक शिला फेंक दी, लेकिन धूर्त वानर ने अपने को उस शिला से बचा लिया और बलराम के शराब के पात्र को लूट लिया। दुष्ट द्विविद ने बलराम की हँसी उड़ाते हुए उन्हें और अधिक क्रुद्ध कर दिया और फिर उसने उस पात्र को तोड़ दिया। उसने तरुणियों के वस्त्रों को भी खींचा जिससे बलराम का और भी अधिक अपमान हुआ। इस प्रकार झूठे गर्व से भरा हुआ बलशाली वानर श्री बलराम का अपमान करता रहा।
 
बलराम, सर्वश्रेष्ठ सेनानी, क्रुद्ध हो गए और उस पर एक शिला फेंक दी, लेकिन धूर्त वानर ने अपने को उस शिला से बचा लिया और बलराम के शराब के पात्र को लूट लिया। दुष्ट द्विविद ने बलराम की हँसी उड़ाते हुए उन्हें और अधिक क्रुद्ध कर दिया और फिर उसने उस पात्र को तोड़ दिया। उसने तरुणियों के वस्त्रों को भी खींचा जिससे बलराम का और भी अधिक अपमान हुआ। इस प्रकार झूठे गर्व से भरा हुआ बलशाली वानर श्री बलराम का अपमान करता रहा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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