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श्लोक 10.67.11  |
दुष्ट: शाखामृग: शाखामारूढ: कम्पयन् द्रुमान् ।
चक्रे किलकिलाशब्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन् ॥ ११ ॥ |
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| अनुवाद |
| वह शरारती बंदर पेड़ की एक शाखा पर चढ़ गया और फिर पेड़ों को हिलाते हुए और किलकिली मचाते हुए अपनी उपस्थिति जताने लगा । |
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| वह शरारती बंदर पेड़ की एक शाखा पर चढ़ गया और फिर पेड़ों को हिलाते हुए और किलकिली मचाते हुए अपनी उपस्थिति जताने लगा । |
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