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श्लोक 10.65.34  |
एवं सर्वा निशा याता एकेव रमतो व्रजे ।
रामस्याक्षिप्तचित्तस्य माधुर्यैर्व्रजयोषिताम् ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| और इस तरह से भगवान बलराम ने व्रज में रमण करते हुए सारी रातें एक रात की तरह ही बिता दीं। उनका मन व्रज की युवतियों की अपूर्व माधुरी से मुग्ध हो गया था। |
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| और इस तरह से भगवान बलराम ने व्रज में रमण करते हुए सारी रातें एक रात की तरह ही बिता दीं। उनका मन व्रज की युवतियों की अपूर्व माधुरी से मुग्ध हो गया था। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत पैंसठ अध्याय समाप्त होता है । |
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