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श्लोक 10.65.32  |
वसित्वा वाससी नीले मालामामुच्य काञ्चनीम् ।
रेये स्वलङ्कृतो लिप्तो माहेन्द्र इव वारण: ॥ ३२ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान बलराम ने नीले वस्त्र और गले में सोने का हार पहना। सुगंधित तेल लगाकर और नाना प्रकार के आभूषणों से सजकर वो इंद्र के शाही हाथी जितने ही सुंदर दिखने लगे। |
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| भगवान बलराम ने नीले वस्त्र और गले में सोने का हार पहना। सुगंधित तेल लगाकर और नाना प्रकार के आभूषणों से सजकर वो इंद्र के शाही हाथी जितने ही सुंदर दिखने लगे। |
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