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श्लोक 10.65.29  |
परं भावं भगवतो भगवन् मामजानतीम् ।
मोक्तुमर्हसि विश्वात्मन् प्रपन्नां भक्तवत्सल ॥ २९ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु मोहे छोड़ दो। हे ब्रह्माण्ड की आत्मा, मैं भगवान के रूप में आपके पद को नहीं जानती थी किन्तु अब मैं आपके चरणों में समर्पित हूँ और आप अपने भक्तों पर सदैव दयालु रहते हैं। |
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| हे प्रभु मोहे छोड़ दो। हे ब्रह्माण्ड की आत्मा, मैं भगवान के रूप में आपके पद को नहीं जानती थी किन्तु अब मैं आपके चरणों में समर्पित हूँ और आप अपने भक्तों पर सदैव दयालु रहते हैं। |
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