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श्लोक 10.65.26  |
पापे त्वं मामवज्ञाय यन्नायासि मयाहुता ।
नेष्ये त्वां लाङ्गलाग्रेण शतधा कामचारिणीम् ॥ २६ ॥ |
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| अनुवाद |
| [बलराम जी कहते हैं] : मेरा तिरस्कार करने वाली पापिनी! तू मेरे बुलाने पर नहीं आती है और केवल अपनी इच्छानुसार ही चलती है। इसलिए, मैं अपने हल की नोक से सौ धाराओं के रूप में तुम्हें यहाँ खींच लाऊँगा। |
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| [बलराम जी कहते हैं] : मेरा तिरस्कार करने वाली पापिनी! तू मेरे बुलाने पर नहीं आती है और केवल अपनी इच्छानुसार ही चलती है। इसलिए, मैं अपने हल की नोक से सौ धाराओं के रूप में तुम्हें यहाँ खींच लाऊँगा। |
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