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श्लोक 10.65.23  |
उपगीयमानचरितो वनिताभिर्हलायुध: ।
वनेषु व्यचरत् क्षीवो मदविह्वललोचन: ॥ २३ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब उनके कार्यों का गान चल रहा था, तब हलायुध मानो मदहोश होकर अपनी स्त्रियों के संग विविध जंगलों में घूम रहे थे। उनकी आँखें मदिरा के प्रभाव के अधीन घूम रहीं थीं। |
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| जब उनके कार्यों का गान चल रहा था, तब हलायुध मानो मदहोश होकर अपनी स्त्रियों के संग विविध जंगलों में घूम रहे थे। उनकी आँखें मदिरा के प्रभाव के अधीन घूम रहीं थीं। |
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