श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 65: बलराम का वृन्दावन जाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.65.13 
कथं नु गृह्णन्त्यनवस्थितात्मनो
वच: कृतघ्नस्य बुधा: पुरस्‍त्रिय: ।
गृह्णन्ति वै चित्रकथस्य सुन्दर-
स्मितावलोकोच्छ्वसितस्मरातुरा: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
श्हरी विचारवान महिलाएँ ऐसे व्यक्ति के वचनों पर कैसे विश्वास कर सकती हैं जिसका हृदय बहुत अस्थिर है और बहुत कृतघ्न है? वे उन पर इसलिए विश्वास कर लेती थीं क्योंकि वे बहुत ही सुंदर ढंग से बोलते हैं और उनकी सुंदर मुस्कुराहट व्यक्ति की कामनाओं को जगा देती हैं।
 
श्हरी विचारवान महिलाएँ ऐसे व्यक्ति के वचनों पर कैसे विश्वास कर सकती हैं जिसका हृदय बहुत अस्थिर है और बहुत कृतघ्न है? वे उन पर इसलिए विश्वास कर लेती थीं क्योंकि वे बहुत ही सुंदर ढंग से बोलते हैं और उनकी सुंदर मुस्कुराहट व्यक्ति की कामनाओं को जगा देती हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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