श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 65: बलराम का वृन्दावन जाना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  10.65.11-12 
मातरं पितरं भ्रातृन् पतीन् पुत्रान् स्वसृनपि ।
यदर्थे जहिम दाशार्ह दुस्त्यजान् स्वजनान् प्रभो ॥ ११ ॥
ता न: सद्य: परित्यज्य गत: सञ्छिन्नसौहृद: ।
कथं नु ताद‍ृशं स्‍त्रीभिर्न श्रद्धीयेत भाषितम् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
"हे दाशार्ह, हमने कृष्ण की खातिर अपनी माताओं, पिताओं, भाइयों, पतियों, पुत्रों और बहनों का भी त्याग कर दिया, यद्यपि इन पारिवारिक सम्बन्धों का परित्याग कर पाना बड़ा कठिन है। किन्तु हे प्रभु, अब वही कृष्ण अचानक हम सबों को छोड़कर हमारे साथ के सारे स्नेह बन्धनों को तोड़कर चले गए हैं। ऐसी स्थिति में कोई स्त्री उनके विश्वास पर भरोसा कैसे कर सकती है?"
 
“O Dasharha, we have abandoned our mothers, fathers, brothers, husbands, sons and sisters for the sake of Krishna, although it is difficult to abandon these family relationships. But now, O Lord, the same Krishna has suddenly abandoned us all, breaking all bonds of affection with us and has gone away. And in such a situation how can a woman trust his promises?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)