vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्रीमद् भागवतम
»
स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ
»
अध्याय 64: राजा नृग का उद्धार
»
श्लोक 42
श्लोक
10.64.42
यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहित: ।
तथा नमत यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डभाक् ॥ ४२ ॥
अनुवाद
जैसे मैं ब्राह्मणों को सावधानीपूर्वक प्रणाम करता हूँ वैसे ही तुम सभी को भी प्रणाम करना चाहिए। जो कोई भी ऐसा नहीं करेगा मैं उसे दण्ड दूँगा।
Just as I always salute the brahmanas with care, you all should salute them in the same way. Whoever does otherwise, I punish him
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×