श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 64: राजा नृग का उद्धार  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.64.42 
यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहित: ।
तथा नमत यूयं च योऽन्यथा मे स दण्डभाक् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे मैं ब्राह्मणों को सावधानीपूर्वक प्रणाम करता हूँ वैसे ही तुम सभी को भी प्रणाम करना चाहिए। जो कोई भी ऐसा नहीं करेगा मैं उसे दण्ड दूँगा।
 
Just as I always salute the brahmanas with care, you all should salute them in the same way. Whoever does otherwise, I punish him
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)