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bhagavat 10.63.47: मैं वैरोचनि के इस असुर-पुत्र का वध नहीं करूँगा, क्योंकि मैंने प्रह्लाद महाराज को आशीर्वाद दिया है कि मैं उनके किसी भी वंशज का वध नहीं करूँगा।   |   bhagavat अध्याय 10.63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  10.63.47 
अवध्योऽयं ममाप्येष वैरोचनिसुतोऽसुर: ।
प्रह्रादाय वरो दत्तो न वध्यो मे तवान्वय: ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
मैं वैरोचनि के इस असुर-पुत्र का वध नहीं करूँगा, क्योंकि मैंने प्रह्लाद महाराज को आशीर्वाद दिया है कि मैं उनके किसी भी वंशज का वध नहीं करूँगा।
 
I will not kill this demon-son of Vairocani because I have blessed Prahlada Maharaja that I will not kill any of his descendants.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)