कालो दैवं कर्म जीव: स्वभावो
द्रव्यं क्षेत्रं प्राण आत्मा विकार: ।
तत्सङ्घातो बीजरोहप्रवाह-
स्त्वन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये ॥ २६ ॥
अनुवाद
समय; भाग्य; कर्म; आत्मा और उसकी प्रवृत्तियाँ; सूक्ष्म भौतिक तत्व; भौतिक शरीर; प्राण वायु; मिथ्या अहंकार; विभिन्न इंद्रियाँ; और जीव के सूक्ष्म शरीर में इन सभी की समग्रता - यह सब आपकी भौतिक माया है, जो बीज और पौधे के अंतहीन चक्र की तरह है। मैं आपकी शरण लेता हूं, जो इस माया का निषेध है।
Time, destiny, karma, the living entity and his nature, the subtle material elements, the physical body, the vital airs, the false ego, the various senses and the totality of these reflected in the subtle body of the living entity—all these are Your Maya, which is like the endless cycle of the seed and the plant. I surrender to You, the negation of this Maya.
तात्पर्य
बीज-रोह-प्रवाह शब्द की व्याख्या इस प्रकार है: शर्तित आत्मा एक भौतिक शरीर स्वीकार करता है, जिसके साथ वह भौतिक दुनिया का आनंद लेने का प्रयास करता है। वह शरीर भविष्य के भौतिक अस्तित्व का बीज (बीज) है क्योंकि जब कोई व्यक्ति उस शरीर से कार्य करता है तो वह आगे की प्रतिक्रियाएँ (कर्म) निर्मित करता है, जो दूसरा भौतिक शरीर स्वीकार करने के दायित्व में बढ़ता (रोह) है। दूसरे शब्दों में, भौतिक जीवन क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला है। सर्वोच्च प्रभु के प्रति समर्पण करने का सरल निर्णय, शर्तित आत्मा को भौतिक विकास और प्रतिक्रिया की इस व्यर्थ पुनरावृत्ति से मुक्त करता है। श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, तन्निषेधं प्रपद्ये शब्द इंगित करता है कि सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान, भगवान कृष्ण , निषेधावधिभूतम् हैं , "नकार का सीमा"। दूसरे शब्दों में, सभी माया नकारे जाने के बाद, सत्य ही शेष रहता है। शिक्षा की प्रक्रिया को ज्ञान की प्राप्ति के माध्यम से अज्ञानता को मिटाने के तरीके के रूप में संक्षिप्त रूप से वर्णित किया जा सकता है। आगमनात्मक, निगमनात्मक और सहज साधनों के माध्यम से, हम भ्रामक, भ्रामक और अपूर्ण का खंडन करने और अपने आप को पूर्ण ज्ञान के एक मंच तक उठाने का प्रयास करते हैं। अंततः, जब सभी भ्रम नकार दिए जाते हैं, जो दृढ़ता से अपने स्थान पर रहता है वह सत्य है, परम व्यक्तित्व भगवान। पिछले पाठ में, शिव-ज्वर ने सर्वोच्च प्रभु का वर्णन सर्वत्मानम केवलं ज्ञप्ति-मात्रम्, "शुद्ध, केंद्रित आध्यात्मिक चेतना" के रूप में किया है। अब शिव-ज्वर इस पाठ में यह कहकर प्रभु के अपने दार्शनिक विवरण को समाप्त करता है कि भौतिक अस्तित्व के विभिन्न पहलू भी सर्वोच्च प्रभु की शक्तियाँ हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि सर्वोच्च प्रभु के अपने शरीर और इंद्रियाँ, जैसा कि तन्निषेधम शब्द से यहाँ निहित है, प्रभु के शुद्ध आध्यात्मिक अस्तित्व से अलग नहीं है। प्रभु का शरीर और इंद्रियाँ उसके बाहरी नहीं हैं, न ही वे उसे ढकते हैं, बल्कि प्रभु अपने आध्यात्मिक रूप और इंद्रियों के समान हैं। आकर्षक विविधता में असीमित, पूर्ण सत्य, भगवान श्री कृष्ण हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥