आचार्यों के अनुसार, शब्द सर्व-आत्मान यह इंगित करता है कि भगवान श्री कृष्ण परमात्मा हैं, सभी जीवों को चेतना देने वाले हैं। कृष्ण इसकी पुष्टि भगवद-गीता (15.15) में करते हैं: मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम पोहनं च। "मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति आती है।"
अपनी टीका में श्रील विस्वनाथ चक्रवर्ती इस बात पर जोर देते हैं कि शिव-ज्वर ने कई तरीकों से भगवान कृष्ण की अपने स्वामी, भगवान शिव पर सर्वोच्चता का एहसास किया है। इसलिए शिव-ज्वर कृष्ण को अनंत-शक्ति, "असीमित शक्ति के अधिकारी"; परेश, "सर्वोच्च नियंत्रक"; और सर्व-आत्मा, "सभी प्राणियों का परमात्मा" - यहाँ तक कि भगवान शिव का भी संबोधित करते हैं।
शब्द केवल ज्ञापत्ति-मात्र यह इंगित करते हैं कि भगवान कृष्ण के पास विशुद्ध सर्वज्ञता है। हमारी सीमित समझ के अनुसार, हम इस दुनिया में कार्य करते हैं, परन्तु भगवान कृष्ण अपनी असीमित समझ के साथ, सृजन, रखरखाव और विनाश के अनंत कार्य करते हैं। जैसा कि श्रील जीव गोस्वामी बताते हैं, यहाँ तक कि वायु जैसे स्थूल तत्वों का कार्य भी उन्हीं पर निर्भर करता है। तैतरीय उपनिषद (2.8.1) इसकी पुष्टि करता है: भिशस्माद वातः पवते। "उनके भय से हवा चलती है।" इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण सभी जीवों के लिए उपासना का अंतिम उद्देश्य हैं।
