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श्लोक 10.62.33  |
तं नागपाशैर्बलिनन्दनो बली
घ्नन्तं स्वसैन्यं कुपितो बबन्ध ह ।
ऊषा भृशं शोकविषादविह्वला
बद्धं निशम्याश्रुकलाक्ष्यरौत्सीत् ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब अनिरुद्ध बाण की सेना का वध कर रहा था, उसी समय महाशक्तिशाली बलि-पुत्र ने क्रोधित होकर उसे नाग-पाश से बाँध लिया। जब ऊषा को अनिरुद्ध के बंदी बना लिए जाने की खबर मिली तो वह दुःख और उदासी से टूट गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और वह जोर-जोर से रोने लगी। |
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| जब अनिरुद्ध बाण की सेना का वध कर रहा था, उसी समय महाशक्तिशाली बलि-पुत्र ने क्रोधित होकर उसे नाग-पाश से बाँध लिया। जब ऊषा को अनिरुद्ध के बंदी बना लिए जाने की खबर मिली तो वह दुःख और उदासी से टूट गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और वह जोर-जोर से रोने लगी। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत बासठ अध्याय समाप्त होता है । |
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