श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  10.62.18-19 
मनुजेषु च सा वृष्णीन् शूरमानकदुन्दुभिम् ।
व्यलिखद् रामकृष्णौ च प्रद्युम्नं वीक्ष्य लज्जिता ॥ १८ ॥
अनिरुद्धं विलिखितं वीक्ष्योषावाङ्‍मुखी ह्रिया ।
सोऽसावसाविति प्राह स्मयमाना महीपते ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, मानवों में से चित्रलेखा ने वृष्णियों के चित्र बनाए जिसमें शूरसेन, आनकदुन्दुभि, बलराम और कृष्ण शामिल थे। जब ऊषा ने प्रद्युम्न का चित्र देखा तो वह लजा गई और जब उसने अनिरुद्ध का चित्र देखा तो उलझन के कारण उसने अपना सिर नीचे झुका लिया। मुस्कुराते हुए, वह बोली, "यही है, यही है, वही है"।
 
हे राजन्, मानवों में से चित्रलेखा ने वृष्णियों के चित्र बनाए जिसमें शूरसेन, आनकदुन्दुभि, बलराम और कृष्ण शामिल थे। जब ऊषा ने प्रद्युम्न का चित्र देखा तो वह लजा गई और जब उसने अनिरुद्ध का चित्र देखा तो उलझन के कारण उसने अपना सिर नीचे झुका लिया। मुस्कुराते हुए, वह बोली, "यही है, यही है, वही है"।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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