श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.62.17 
इत्युक्त्वा देवगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगान् ।
दैत्यविद्याधरान् यक्षान् मनुजांश्च यथालिखत् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
यह कहते हुए चित्रलेखा ने विभिन्न देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों, चारणों, पन्नगों, दैत्यों, विद्याधरों, यक्षों और मनुष्यों के सटीक चित्र बनाए।
 
यह कहते हुए चित्रलेखा ने विभिन्न देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों, चारणों, पन्नगों, दैत्यों, विद्याधरों, यक्षों और मनुष्यों के सटीक चित्र बनाए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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