श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  10.62.15 
तमहं मृगये कान्तं पाययित्वाधरं मधु ।
क्व‍ापि यात: स्पृहयतीं क्षिप्‍त्‍वा मां वृजिनार्णवे ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रियतम को मैं तलाश रही हूँ, उसने मुझे अपने अधरों के मधुर रस का पान कराया और फिर कहीं चला गया। उसने मुझे दुख के सागर में डुबो दिया है और मैं उसके लिए प्यासी हूँ।
 
जिस प्रियतम को मैं तलाश रही हूँ, उसने मुझे अपने अधरों के मधुर रस का पान कराया और फिर कहीं चला गया। उसने मुझे दुख के सागर में डुबो दिया है और मैं उसके लिए प्यासी हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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