| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ » अध्याय 61: बलराम द्वारा रुक्मी का वध » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 10.61.5  | इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता
ब्रह्मादयोऽपि न विदु: पदवीं यदीयाम् ।
भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-
हासावलोकनवसङ्गमलालसाद्यम् ॥ ५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | इस प्रकार इन स्त्रियों को लक्ष्मीपति ही पति रूप में प्राप्त हुए, यद्यपि ब्रह्मा जैसे बड़े-बड़े देवता भी उन तक पहुँचने की विधि नहीं जानते। प्रेम में निरंतर वृद्धि के साथ वे उनके प्रति अनुराग का अनुभव करती थीं, उनसे हास्ययुक्त चितवनों का आदान-प्रदान करती थीं, नित नवीन घनिष्ठता के साथ उनसे समागम की लालसा करती हुई अन्यान्य अनेक विधियों से रमण करती थीं। | | | | इस प्रकार इन स्त्रियों को लक्ष्मीपति ही पति रूप में प्राप्त हुए, यद्यपि ब्रह्मा जैसे बड़े-बड़े देवता भी उन तक पहुँचने की विधि नहीं जानते। प्रेम में निरंतर वृद्धि के साथ वे उनके प्रति अनुराग का अनुभव करती थीं, उनसे हास्ययुक्त चितवनों का आदान-प्रदान करती थीं, नित नवीन घनिष्ठता के साथ उनसे समागम की लालसा करती हुई अन्यान्य अनेक विधियों से रमण करती थीं। | | ✨ ai-generated | | |
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