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श्लोक 10.61.3  |
चार्वब्जकोशवदनायतबाहुनेत्र-
सप्रेमहासरसवीक्षितवल्गुजल्पै: ।
सम्मोहिता भगवतो न मनो विजेतुं
स्वैर्विभ्रमै: समशकन् वनिता विभूम्न: ॥ ३ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान् की पत्नियाँ उनके कमल सदृश सुंदर मुख, लंबी भुजाओं और उनकी बड़ी-बड़ी आँखों से बड़े सम्मोहित थीं। हँसी की भाव भरी उनकी दया दृष्टि और मनोहर वार्तालाप ने उनकी पत्नियों पर अपना डोरा डाल रखा था। किन्तु यह समस्त मोहिनी शक्ति युक्त स्त्रियाँ भी सर्वशक्तिमान भगवान् के मन को अपने वश में नहीं कर सकीं। |
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| भगवान् की पत्नियाँ उनके कमल सदृश सुंदर मुख, लंबी भुजाओं और उनकी बड़ी-बड़ी आँखों से बड़े सम्मोहित थीं। हँसी की भाव भरी उनकी दया दृष्टि और मनोहर वार्तालाप ने उनकी पत्नियों पर अपना डोरा डाल रखा था। किन्तु यह समस्त मोहिनी शक्ति युक्त स्त्रियाँ भी सर्वशक्तिमान भगवान् के मन को अपने वश में नहीं कर सकीं। |
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