श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 61: बलराम द्वारा रुक्मी का वध  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.61.25 
दौहित्रायानिरुद्धाय पौत्रीं रुक्‍म्याददाद्धरे: ।
रोचनां बद्धवैरोऽपि स्वसु: प्रियचिकीर्षया ।
जानन्नधर्मं तद् यौनं स्‍नेहपाशानुबन्धन: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
रुक्मी ने, भगवान् हरि से अपनी घोर शत्रुता होने के बावजूद, अपनी पौत्री रोचना को अपनी कन्या के पुत्र अनिरुद्ध को दे दिया। इस विवाह को अधार्मिक मानते हुए भी, स्नेह-बन्धन से बँधे रुक्मी ने अपनी बहन को प्रसन्न करने की इच्छा रखी।
 
रुक्मी ने, भगवान् हरि से अपनी घोर शत्रुता होने के बावजूद, अपनी पौत्री रोचना को अपनी कन्या के पुत्र अनिरुद्ध को दे दिया। इस विवाह को अधार्मिक मानते हुए भी, स्नेह-बन्धन से बँधे रुक्मी ने अपनी बहन को प्रसन्न करने की इच्छा रखी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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