श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 6: पूतना वध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.6.33 
कलेवरं परशुभिश्छित्त्वा तत्ते व्रजौकस: ।
दूरे क्षिप्‍त्वावयवशो न्यदहन् काष्ठवेष्टितम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
व्रजवासियों ने फरसों के सहारे पूतना के विशालकाय शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर डाला। तत्पश्चात उन्होंने उन टुकड़ों को दूर फेंक दिया और लकड़ी से ढँक कर उन्हें भस्म कर दिया।
 
The people of Vraj chopped Putana's body into pieces with axes. Then they threw the pieces away and covered them with wood and reduced them to ashes.
तात्पर्य
ये प्रचलन है कि नाग के मर जाने पर, उसके शरीर को टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर उसके जीवित हो जाने के भय से उसे हवा के संपर्क से बचाया जाता है। मात्र सांप को मार देना ही पर्याप्त नहीं है; उसके मरने के बाद उसे टुकड़ों में काट उसे जला दिया जाता है, तब जाकर खतरा टलता है। पूतना एक बहुत बड़े नाग के सामान थी, और इसीलिए ग्वालों ने भी वही सावधानी बरतते हुए उसके शरीर को भस्म कर दिया था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)