श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 6: पूतना वध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.6.1 
श्रीशुक उवाच
नन्द: पथि वच: शौरेर्न मृषेति विचिन्तयन् ।
हरिं जगाम शरणमुत्पातागमशङ्कित: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव जी ने कहा : हे राजा! जब नंद महाराज घर लौट रहे थे, तब उन्होंने सोचा कि वसुदेव ने जो कुछ भी कहा था, वह असत्य या बेकार नहीं हो सकता। निश्चित ही गोकुल में कुछ गड़बड़ का खतरा होगा। जैसे ही नंद महाराज ने अपने खूबसूरत बेटे कृष्ण के लिए खतरे के बारे में सोचा, उन्हें डर लगने लगा और उन्होंने सर्वशक्तिमान भगवान के चरणों में शरण ली।
 
Sukadeva Goswami said: O King! When Nanda Maharaja was returning home he reflected that what Vasudeva had said could not be false or meaningless. There must have been some danger of disturbances in Gokula. As soon as Nanda Maharaja thought of the danger to his beautiful son Krishna, he became frightened and took refuge in the lotus feet of the Supreme Controller.
तात्पर्य
जब भी कोई खतरा होता है, शुद्ध भक्त भगवान के संरक्षण व शरण के बारे में सोचता है। इस बारे में भगवद-गीता (9.33) में यह भी सलाह दी गई है: अनित्यम् असुखं लोकम् इमं प्राप्य भजस्व माम। इस भौतिक संसार में हर कदम पर ख़तरा होता है (पदं पदं यद् विपदां)। इसलिए एक भक्त के पास भगवान की शरण लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)